भक्तों में एक प्रश्न बहुत पूछा जाता है : बड़ा कौन है, भगवान या भगवान का नाम? सुनने में प्रश्न ही उल्टा लगता है, भला नामी से बड़ा उसका नाम कैसे हो सकता है? पर संत बार-बार कहते हैं कि नाम, नामी से भी बड़ा है। इसी सत्य को जगत के सामने प्रत्यक्ष करने के लिए देवर्षि नारद ने एक अद्भुत लीला रची, जिसके केंद्र में थे एक राजा : सुकंत।
नारद जी की विचित्र सीख
बात उस समय की है जब भगवान श्रीराम अयोध्या में चक्रवर्ती सम्राट के रूप में विराजमान थे। सुकंत नाम के एक प्रतापी राजा प्रभु के दर्शन करने आए। दरबार में उस दिन बड़े-बड़े ब्रह्मर्षि पधारे हुए थे। सभा में प्रवेश से पहले ही बाहर उनकी भेंट देवर्षि नारद से हो गई।
नारद जी ने पूछा कि भीतर प्रभु के दर्शन करने जा रहे हो? सुकंत ने हाथ जोड़कर हामी भरी। तब देवर्षि ने एक विचित्र सीख दे दी, "भीतर सब ऋषियों के चरणों में माथा टेकना, पर विश्वामित्र जी को केवल हाथ जोड़ देना, उनके आगे माथा मत रखना।" सुकंत को कारण समझ नहीं आया, पर देवर्षि की बात को आज्ञा मानकर उन्होंने गाँठ बाँध ली। उन्हें क्या पता था कि इस छोटी-सी बात से कितनी बड़ी लीला खड़ी होने वाली है।
दरबार में आधा प्रणाम
सुकंत ने दरबार में जाकर भगवान को नमन किया और एक-एक कर सब ऋषियों के चरणों में मस्तक रखा। विश्वामित्र जी के पास पहुँचे तो केवल हाथ जोड़कर आगे बढ़ गए। ध्यान में बैठे विश्वामित्र जी का उस समय इस ओर ध्यान तक नहीं गया, और सभा पूरी हो गई।
तब नारद जी स्वयं विश्वामित्र जी के पास जा बैठे और छेड़ा, "आपने कुछ देखा नहीं? सुकंत सबके आगे माथा टेकता गया, पर आपके आगे बस हाथ जोड़कर निकल गया। कहता है कि आप मूल में तो क्षत्रिय हैं, ब्रह्मर्षि तो तपस्या से बने हैं।" इतना सुनते ही विश्वामित्र जी का क्रोध भड़क उठा। नारद जी ने यह कहकर आग और बढ़ा दी कि ऐसे अनादर का दंड तो मिलना ही चाहिए, और उनकी शिकायत श्रीराम तक पहुँचवा दी। देवर्षि की इस पूरी लीला का प्रयोजन एक ही था : संसार को नाम की सामर्थ्य दिखाना।
श्रीराम की भीषण प्रतिज्ञा
विश्वामित्र जी ने भरे दरबार में कहा कि रघुनाथ, आपके ही दरबार में हमारा अपमान हुआ है, और सूर्य ढलने से पूर्व सुकंत का मस्तक मेरे चरणों में आना चाहिए। गुरु का आहत हृदय देखकर श्रीराम ने वचन दे दिया, "गुरुदेव, धैर्य रखिए। सूर्यास्त से पूर्व उसका मस्तक आपके चरणों में न पहुँचा, तो मैं रघुवंशी नहीं।"
नारद जी सीधे सुकंत के पास जा पहुँचे और बोले कि सुन लिया? स्वयं भगवान ने तुम्हारे वध की प्रतिज्ञा कर ली है! सुकंत के पैरों तले धरती खिसक गई। जिनके दर्शन को आए थे, वही अब वध करने वाले थे। काँपते हुए बोले, "देवर्षि! मैंने तो बस आपके कहने से ऐसा किया था। अब उपाय भी आप ही बताइए। प्रभु का वचन कभी मिथ्या नहीं होता, और उनका बाण अमोघ है।"
अंजनी माता का वचन
नारद जी बोले कि रक्षक अब एक ही है : हनुमान जी। सुकंत ने शंका की, "पर वे तो स्वयं राम जी के दास हैं, प्रभु की आज्ञा के विरुद्ध कैसे जाएँगे?" नारद जी ने युक्ति सुझाई, "एक ही हैं जिनकी बात हनुमान जी कभी नहीं टालते : उनकी माता अंजनी। चलो, मैं तुम्हारी भेंट करवा देता हूँ।"
सुकंत ने माता अंजनी के चरण पकड़ लिए और रोते हुए कहा, "माँ! त्रिभुवन में अब आपके सिवा मेरा कोई रक्षक नहीं। एक राजा मेरे प्राण लेना चाहता है।" ममतामयी माता ने बिना पूरा भेद जाने वचन दे दिया, "मेरा पुत्र हनुमान महाबली है, और वह माँ की आज्ञा कभी नहीं टालता। जा बेटा, आज से तेरी रक्षा मेरा व्रत है।"
हनुमान जी ने माता की आज्ञा सिर-आँखों पर ली। पर जब खुला कि जिस "राजा" से रक्षा करनी है, वे स्वयं उनके प्राण-प्यारे प्रभु श्रीराम हैं, तो वे स्तब्ध रह गए। एक ओर प्रभु की प्रतिज्ञा, दूसरी ओर माता का वचन। माता बोलीं कि बेटा, वचन दे दिया है, अब निभाना ही है। तब हनुमान जी ने ऐसा मार्ग निकाला जिसमें न प्रभु के विरुद्ध शस्त्र उठे, न माता का वचन टूटे।
हर साँस में सीताराम
हनुमान जी सुकंत को एकांत में ले गए और समझाया, "उपाय बस एक है। अब अपनी हर साँस में राम-नाम बसा लो। जहाँ नाम अखंड चलता है, वहाँ बाण की गति थम जाती है। पर स्मरण रहे, क्रम टूटे नहीं। एक क्षण का भी अंतर पड़ा, तो अमोघ बाण अपना काम कर जाएगा। अब चिंता छोड़, बैठ, और जप में डूब जा।"
सुकंत आँखें मूँदकर जपने लगे, "सीताराम... सीताराम... सीताराम..." और स्वयं हनुमान जी करताल उठाकर उनके चारों ओर नाम-संकीर्तन करते हुए नृत्य करने लगे। एक ओर अयोध्या में प्रतिज्ञा की घड़ियाँ बीत रही थीं, दूसरी ओर एकांत में नाम की गंगा बह रही थी।
अमोघ बाण लौट आया
सूर्यास्त निकट आया तो भगवान श्रीराम ने अमोघ बाण का संधान किया। बाण तीव्र वेग से छूटा और वहीं जा पहुँचा जहाँ संकीर्तन चल रहा था। पर जहाँ से सीताराम की धुन उठ रही थी, उस सीमा पर पहुँचते ही बाण ठहर गया, और लक्ष्य को बिना छुए परिक्रमा कर लौट आया।
प्रभु चकित रह गए। अमोघ बाण और खाली लौट आए, ऐसा तो कभी नहीं हुआ था। उन्होंने लक्ष्मण जी को देखने भेजा। वहाँ का दृश्य ही ऐसा था : आँखों में प्रेम के आँसू लिए हनुमान जी करताल बजाते नाच रहे थे, और सुकंत नाम की समाधि में डूबा था। देखते ही देखते लक्ष्मण जी भी सुध-बुध भूलकर ताली बजाते हुए उसी कीर्तन में लीन हो गए, लौटना ही भूल गए।
जहाँ नाम, वहाँ बाण असमर्थ
अंत में विश्वामित्र जी, नारद जी और ऋषियों सहित स्वयं भगवान श्रीराम वहाँ पधारे। सामने देखा तो हनुमान जी, लक्ष्मण जी और सुकंत, तीनों सीताराम की धुन में डूबे हैं। यह प्रेम देखकर प्रभु का हृदय करुणा से भर आया। वे बोले, "अब रहस्य समझ में आया। जहाँ मेरा नाम अखंड बह रहा हो, वहाँ मेरे बाण की भी गति नहीं।"
प्रतिज्ञा भी रह गई, प्राण भी
पर अब प्रतिज्ञा का क्या हो? श्रीराम ने गुरुदेव से विनम्रता से निवेदन किया, "गुरुदेव, आज्ञा यह थी कि सूर्यास्त से पहले उसका मस्तक आपके चरणों में हो। यह तो कहा ही नहीं था कि मस्तक काटकर लाया जाए।" फिर सुकंत की ओर देखकर बोले कि जा, अपना मस्तक गुरुदेव के चरणों में रख दे। सुकंत ने दौड़कर विश्वामित्र जी के चरणों में माथा टेक दिया। मस्तक चरणों तक पहुँच गया, प्रतिज्ञा पूर्ण हो गई, और प्राण भी बच गए। विश्वामित्र जी का हृदय भी प्रसन्न हो उठा।
तब नारद जी मुस्कुराए, "प्रभु! इसमें न सुकंत का दोष है, न विश्वामित्र जी का। यह लीला तो जगत को यह दिखाने के लिए थी कि आपका नाम आपके अमोघ बाण से भी बड़ा है। जिस कंठ में निरंतर नाम की धुन चलती हो, उसके आगे तो सुदर्शन चक्र की भी गति नहीं।"
कथा का सार
भगवान स्वयं मर्यादा, प्रतिज्ञा और धर्म के बंधन में बँधे रहते हैं, पर उनका नाम किसी बंधन में नहीं बँधता। नाम केवल दो चीज़ें माँगता है : प्रेम और निरंतरता। हर साँस के साथ, बिना नागा, बिना थके।
इसलिए संत कहते हैं कि नाम-जप आज से ही, अभी से ही शुरू कर दो। जप करते हुए जीवन में विपत्तियाँ आएँ तो घबराना मत, वह पुराने कर्मों का हिसाब चुकता हो रहा होता है। बस नाम की डोर मत छोड़ना। जिसने हर साँस में सीताराम बसा लिया, उसका अमोघ बाण भी कुछ नहीं बिगाड़ सका, तो फिर संसार के संकट क्या बिगाड़ेंगे?
॥ सिया राम चरण आश्रित ॥