दोहा
श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
अर्थ: गुरु के चरण-कमलों की धूल से अपने मन के दर्पण को निर्मल करके, मैं श्रीरघुपति का वह पवित्र यश वर्णन करता हूँ, जो चारों फल, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, प्रदान करने वाला है।
भाव: जहाँ गुरु हैं, वहाँ पहला काम है, अपने मन को साफ करना। कोई भी पाठ निर्मल मन से ही सफल होता है।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार॥
अर्थ: अपने तन को बुद्धिहीन जानकर मैं पवनकुमार को स्मरण करता हूँ। हे बाबा! मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करें और मेरे सभी क्लेश एवं विकार दूर करें।
भाव: गोस्वामी जी की यह विनम्रता देखिए, मैं बुद्धिहीन हूँ। जो अपनी सीमा जानता है, उसी पर बाबा की कृपा उतरती है।
चालीसा : सम्पूर्ण पाठ
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
अर्थ: हे हनुमान जी! आपकी जय हो। आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं। हे कपीश्वर! तीनों लोकों में, स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में, आपकी कीर्ति प्रकाशित है।
भाव: बाबा की महिमा तीन लोकों से बड़ी है। फिर हमारी छोटी-सी मुश्किल उनसे बड़ी कैसे हो सकती है?
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
अर्थ: आप श्रीराम के दूत हैं और अतुलनीय बल के धाम हैं। आप अंजनी माता के पुत्र हैं और पवनपुत्र के नाम से जाने जाते हैं।
भाव: जो राम का काम करे, उसका बल अपरंपार होता है। सेवा का नाम ही शक्ति है।
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
अर्थ: हे महावीर! आप विक्रमी और बजरंगी हैं। आप कुबुद्धि को दूर करने वाले और सुबुद्धि के साथी हैं।
भाव: बाबा केवल बाहरी शत्रुओं को नहीं, भीतर की बुरी सोच को भी हराते हैं। सबसे बड़ा युद्ध मन के भीतर है।
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुँचित केसा॥
अर्थ: आपका वर्ण सोने के समान है और आप सुंदर वेश में विराजते हैं। आपके कानों में कुंडल हैं और बाल घुंघराले हैं।
भाव: गोस्वामी जी बाबा का रूप आँखों में बसाते हैं। जैसे कोई अपने प्रिय को बार-बार याद करता है।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे। काँधे मूँज जनेऊ साजे॥
अर्थ: हाथ में वज्र और ध्वजा सुशोभित हैं। कंधे पर मूँज घास का जनेऊ शोभा पाता है, एक ओर शक्ति, दूसरी ओर भक्ति।
भाव: बाबा वीर भी हैं, भक्त भी। हाथ में वज्र है, परन्तु हृदय में राम नाम है।
शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग-वंदन॥
अर्थ: आप शंकर जी के अवतार हैं और केसरी जी के नंदन हैं। आपका तेज और प्रताप इतना महान है कि सारा जगत आपको वंदन करता है।
भाव: जिस घर में बाबा हों, वहाँ न डर है, न कमी। तीन लोक के वंदनीय जब अपने घर में हों तो क्या चाहिए?
विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
अर्थ: आप विद्यावान हैं, गुणवान हैं, अत्यंत चतुर हैं। और फिर भी राम का काम करने के लिए सदा आतुर रहते हैं।
भाव: सच्चा ज्ञान वह नहीं जो अहंकार दे। सच्चा ज्ञान वह है जो सेवा की व्याकुलता दे। बाबा यही सिखाते हैं।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
अर्थ: आप प्रभु के चरित्र सुनने में रस लेते हैं। और आपके मन में राम, लक्ष्मण और सीता जी सदा निवास करते हैं।
भाव: जिस हृदय में राम हों, वह हृदय बाबा का हृदय है। बाबा प्रभु के सच्चे प्रेम का प्रतीक हैं।
सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा॥
अर्थ: आपने सूक्ष्म रूप धारण करके सीता माँ को दर्शन दिए, ताकि वे भयभीत न हों। फिर भयंकर रूप धारण करके लंका जला दी।
भाव: बाबा जानते हैं, कब कोमल होना है, कब तूफान बनना है। एक ही शक्ति, दो अलग रूप।
भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥
अर्थ: आपने भीम जैसा विशाल रूप धारण करके असुरों का संहार किया और रामचंद्र जी के सभी काज सँवारे।
भाव: एक सच्चे सेवक का यही लक्ष्य होता है, स्वामी का काम हो जाए, चाहे कुछ भी करना पड़े।
लाय सँजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये॥
अर्थ: आप संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी को जीवित किया। और श्रीरघुवीर ने प्रसन्न होकर आपको अपने हृदय से लगा लिया।
भाव: राम ने बाबा को सीने से लगाया। इससे बड़ा कोई पुरस्कार हो सकता है? वह आलिंगन ही सच्ची सेवा की प्राप्ति है।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई॥
अर्थ: रघुपति राम जी ने हनुमान जी की बहुत प्रशंसा की और कहा, तुम मुझे मेरे प्रिय भाई भरत के समान प्रिय हो।
भाव: भरत राम के सबसे प्रिय भाई थे। उनके बराबर कहना, राम के हृदय में बाबा का स्थान सबसे ऊँचा है।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
अर्थ: हज़ार मुख वाले शेषनाग भी आपका यश गाते हैं। यह कहकर श्रीपति राम जी ने आपको अपने कंठ से लगा लिया।
भाव: शेषनाग हज़ार मुखों से गाते हैं, फिर भी बाबा की महिमा अधूरी रहती है। वे अनंत हैं।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद-सारद सहित अहीसा॥
अर्थ: सनक आदि ऋषियों ने, ब्रह्मा जी ने, नारद जी ने, सरस्वती जी ने और शेषनाग ने, सबने हनुमान जी की महिमा गाई है।
भाव: जब बड़े-बड़े देवता और ऋषि बाबा का यश गाते हैं, तो हम छोटे मनुष्यों का क्या? बस शीश झुकाना चाहिए।
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥
अर्थ: यमराज, कुबेर और आठों दिशाओं के स्वामी, कोई भी कवि या विद्वान बाबा की महिमा को पूरी तरह नहीं कह सकता।
भाव: गोस्वामी जी की विनम्रता, मैं क्या लिखूँ, मैं तो एक अदना-सा कवि हूँ। सच्ची भक्ति सदा विनय के साथ आती है।
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
अर्थ: आपने सुग्रीव जी का महान उपकार किया, उन्हें श्रीराम जी से मिलवाया और उन्हें राज-सिंहासन दिलवाया।
भाव: बाबा स्वयं कुछ नहीं माँगते और दूसरों को राज्य दिलाते हैं। निष्काम सेवक का यही स्वभाव है।
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना। लंकेश्वर भये सब जग जाना॥
अर्थ: विभीषण ने आपकी सलाह मानी और वे लंका के राजा बने, यह सारी दुनिया जानती है।
भाव: जिस पर बाबा की कृपा हो, वह कभी हार नहीं सकता। बाबा की संगति में धर्म पर रहने वाला राज्य पाता है।
जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
अर्थ: हज़ारों योजन दूर स्थित सूर्य को आपने बचपन में मीठा फल समझकर निगल लिया, इतनी अपार शक्ति है आपकी।
भाव: बचपन में सूर्य को फल समझना, इसमें बाबा की मासूमियत भरी शक्ति है। बल और भोला स्वभाव साथ-साथ।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
अर्थ: राम जी की मुद्रिका मुँह में रखकर आपने समुद्र पार किया, इसमें कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि राम का नाम ही आपकी शक्ति है।
भाव: राम का नाम मुख में हो तो समुद्र भी नहीं रोक सकता। नाम ही नौका है, नाम ही सहारा है।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
अर्थ: संसार में जितने भी दुर्गम काज हैं, सभी आपकी कृपा से सुगम हो जाते हैं।
भाव: जब कोई काम बहुत कठिन लगे, बस बाबा को याद करो। वे दुर्गम को सुगम करने वाले हैं।
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
अर्थ: आप राम जी के द्वार के रखवाले हैं। आपकी आज्ञा के बिना वहाँ कोई प्रवेश नहीं कर सकता।
भाव: इसीलिए बाबा को पहले मनाते हैं। हनुमान जी को प्रसन्न करो, राम जी स्वयं मिलेंगे।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना॥
अर्थ: जो आपकी शरण में है, उसे सभी सुख मिलते हैं। जब आप रक्षक हैं तो फिर डर किस बात का?
भाव: बाबा की शरण में एक ही बात होती है, निश्चिंतता। हृदय का डर समाप्त हो जाता है जब बाबा के चरण पकड़ लो।
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
अर्थ: आप अपना तेज स्वयं ही संभाल लेते हैं। आपकी एक हुँकार से तीनों लोक काँप जाते हैं।
भाव: जिनसे सम्पूर्ण सृष्टि डरती है, वे हमारे बाबा हैं। और वही बाबा हमारी रक्षा करते हैं। यह सोचकर ही मन को चैन आता है।
भूत पिशाच निकट नहि आवै। महावीर जब नाम सुनावै॥
अर्थ: भूत, पिशाच और बुरी शक्तियाँ पास नहीं आतीं जब महावीर का नाम लिया जाता है।
भाव: बाबा का नाम ही कवच है। मन में बुराई हो या बाहर अँधेरे में डर, जय हनुमान बोलने से सब दूर हो जाता है।
नासै रोग हरे सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
अर्थ: हनुमत वीर का नाम निरंतर जपने से सभी रोग नष्ट होते हैं और हर प्रकार की पीड़ा दूर होती है।
भाव: कोई भी तकलीफ हो, तन की हो या मन की, बाबा का नाम दवाई है। निरंतर का अर्थ है, छोड़ना नहीं, बार-बार जपो।
संकट तैं हनुमान छुड़ावै। मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥
अर्थ: जो मन से, कर्म से और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, उसे हनुमान जी सभी संकटों से मुक्त करते हैं।
भाव: तीन चीज़ें एक साथ, सोचना भी बाबा का, करना भी बाबा का, बोलना भी बाबा का। यही सच्चा ध्यान है।
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
अर्थ: राम जी तपस्वी राजा हैं, सबसे ऊपर हैं। और उनके सभी काज आपने ही सँवारे हैं।
भाव: बाबा और राम एक-दूसरे को पूरा करते हैं। बाबा के बिना राम का काज अधूरा, राम के बिना बाबा का जीवन सूना।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥
अर्थ: जो भी कोई अपनी इच्छा लेकर आता है, उसे अनंत जीवन का फल प्राप्त होता है।
भाव: बाबा के पास खाली हाथ मत जाओ, मन की कोई न कोई बात कहिए। वे उससे भी अधिक देते हैं जो माँगा नहीं होता।
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
अर्थ: चारों युगों में, सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि, आपका प्रताप प्रसिद्ध है। सम्पूर्ण जगत में आपकी रोशनी फैली हुई है।
भाव: कलियुग में बाबा का नाम सबसे अधिक आवश्यक है। इस अँधेरे ज़माने में बाबा ही रोशनी हैं।
साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अर्थ: आप साधु-संतों के रखवाले हैं, असुरों का संहार करने वाले हैं और राम के लाड़ले हैं।
भाव: जो अच्छा करना चाहता है, जो सच्चा रहना चाहता है, बाबा उसकी रक्षा करते हैं। संत के साथ होना बाबा के साथ सुरक्षित रहना है।
अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
अर्थ: आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने का वरदान जानकी माँ ने आपको दिया है, आप इनके दाता हैं।
भाव: स्वयं माँ सीता ने वरदान दिया। अर्थात् जो बाबा देते हैं वह माँ की कृपा से देते हैं। एक शक्ति, एक प्रेम।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
अर्थ: आपके पास राम नाम का रसायन है। आप सदा रघुपति के दास बनकर रहते हैं।
भाव: बाबा के पास इतनी शक्ति है पर वे दास कहलाना पसंद करते हैं। सच्ची शक्ति दासत्व में है, अहंकार में नहीं।
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै॥
अर्थ: आपका भजन करने से राम जी मिलते हैं और जन्म-जन्म के दुख मिट जाते हैं।
भाव: बाबा का भजन करो, राम मिल जाएँगे। बाबा वह सेतु हैं जो हमें राम तक ले जाता है।
अंतकाल रघुवरपुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
अर्थ: अंतकाल में जो बाबा का भक्त होता है वह राम-धाम जाता है। और यदि वहाँ नहीं जाता तो जन्म-जन्म हरि-भक्त कहलाता है।
भाव: दो विकल्प, या तो राम-धाम, या फिर भक्ति के साथ जन्म। दोनों श्रेष्ठ हैं। बाबा के भक्त का कोई नुकसान नहीं होता।
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्व सुख करई॥
अर्थ: बाकी देवताओं को मन में न भी रखो, केवल हनुमान जी की सेवा करो, सभी सुख मिल जाएगा।
भाव: यह अहंकार नहीं, यह वचन है। बाबा अपने भक्त का पूरा ध्यान रखते हैं। एक ही चरणों में टिक जाओ।
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
अर्थ: जो हनुमत बलवीर को स्मरण करता है, उसके सभी संकट कटते हैं और सारी पीड़ा मिट जाती है।
भाव: केवल एक काम, सुमिरन। नाम लो, दिल से लो। बाबा का काम है बाकी सब सँभालना।
जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरु देव की नाईं॥
अर्थ: हे हनुमान गोसाईं! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप गुरुदेव की तरह कृपा करें।
भाव: तीन बार जय, तीन बार हृदय से पुकारना। और बाबा को गुरु की तरह मानना, यही सच्ची भक्ति की पकड़ है।
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
अर्थ: जो हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करे, उसे बंधन से मुक्ति मिलती है और महासुख की प्राप्ति होती है।
भाव: सौ बार का अर्थ है, निरंतर, बार-बार। एक बार नहीं चलेगा। प्रेम बार-बार कहना चाहता है।
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
अर्थ: जो यह हनुमान चालीसा पढ़े उसे सिद्धि मिलती है। इसके साक्षी स्वयं गौरीश अर्थात् शिव जी हैं।
भाव: वचन गोस्वामी जी का नहीं, वचन शिव जी का है। भोले नाथ का किया हुआ वचन पूरा होता है।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
अर्थ: तुलसीदास सदा हरि के सेवक हैं। हे नाथ! मेरे हृदय में निवास करो।
भाव: यहाँ आकर चालीसा रुक जाती है। गोस्वामी जी ने केवल एक माँगा, बस मेरे हृदय में रहना। धन नहीं, यश नहीं, स्वर्ग नहीं, बस आप। क्या हम भी आज यही माँग सकते हैं?
समापन दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
अर्थ: हे पवनपुत्र! संकट हरने वाले, मंगल की मूर्ति, राम, लक्ष्मण और सीता सहित मेरे हृदय में निवास करो, हे देवराज!
भाव: चालीसा यहाँ समाप्त होती है, पर यह समाप्ति नहीं, एक निमंत्रण है। बाबा को हृदय में बुलाना। यह पाठ का अंत नहीं, भक्ति का आरम्भ है।
॥ जय बजरंगबली ॥
॥ जय सीता राम ॥
॥ सिया राम चरण आश्रित ॥